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पोस्ट्स

मे, २०२५ पासूनच्या पोेस्ट दाखवत आहे

आश्रुंच्या धारा

या सागराच्या लाटा छेदिती काळजाला माझ्या आश्रुंच्या या धारा शोधीती पावसाला फाटल्या रानाला शब्द फुटलेला पावसाच्या वाटेवरी डोळा हा दिपलेला झोपडीच्या माझ्या दारी आहे ...

Aaino Ke Shahar Mai || आईनों के शहर में || Someshwar Sirsat

    आओ लेकर के चला हूं में सबको आईनों के शहर में इंसान समझते हैं जो खुदको उन्हें आईना दिखानें  और चलते फिरते देखे हैं मैंने मुर्दे यहां जहां पर अब मुझे यहां कोई  इंसान नजर नहीं आता   अन्याय को सहना ये इंसान का लक्षण नहीं होता और मुर्दों को इस बात का कुछ असर नहीं होता मैं उन मुर्दों को उनकी चला हूं सूरत को दिखाने इंसान समझते हैं जो खुदको उन्हें आईना दिखानें  और भेड़ियों को देखा मैने जब नेता के भेस में देश को लुट रखा इन्होंने अब खादी के भेस में उन भेड़ियों को चला हूं उनका ही तारुख कराने  इंसान समझते हैं जो खुदको उन्हें आईना दिखानें   सोमेश्वर सिरसाट...