आओ लेकर के चला हूं में सबको आईनों के शहर में इंसान समझते हैं जो खुदको उन्हें आईना दिखानें और चलते फिरते देखे हैं मैंने मुर्दे यहां जहां पर अब मुझे यहां कोई इंसान नजर नहीं आता अन्याय को सहना ये इंसान का लक्षण नहीं होता और मुर्दों को इस बात का कुछ असर नहीं होता मैं उन मुर्दों को उनकी चला हूं सूरत को दिखाने इंसान समझते हैं जो खुदको उन्हें आईना दिखानें और भेड़ियों को देखा मैने जब नेता के भेस में देश को लुट रखा इन्होंने अब खादी के भेस में उन भेड़ियों को चला हूं उनका ही तारुख कराने इंसान समझते हैं जो खुदको उन्हें आईना दिखानें सोमेश्वर सिरसाट...
Someshwar Sirsat Shayari हा माझा अधिकृत ब्लॉग असून मी, कवी, गीतकार व शायर सोमेश्वर सिरसाट, सामाजिक, राजकीय, विद्रोही, प्रेम, वास्तववादी तसेच शिव-फुले-शाहू-आंबेडकर विचारसरणीवर आधारित कविता, गाणी, शायरी आणि लेख या ब्लॉगद्वारे प्रकाशित करतो. समाजातील अन्याय, बेरोजगारी, शेतकरी, कामगार, शिक्षण, परिवर्तन आणि मानवी भावनांना शब्दबद्ध करण्याचा माझा प्रामाणिक प्रयत्न असतो. मराठी साहित्य, भीमगीत, परिवर्तनवादी लेखन, सामाजिक चळवळी आणि जनतेच्या प्रश्नांवर प्रभावी रचना वाचण्यासाठी माझ्या ब्लॉगला नक्की भेट द्या