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सौदागरों के हाथों वतन | विद्रोही कविता सोमेश्वर सिरसाट | Vidrohi Kavita Someshwar Sirsat

🔹 “सौदागरों के हाथों वतन” ✍️ कवि: सोमेश्वर सिरसाट बेचने चले है ये अब जहाँ साथियों, सौदागरों के हाथों में वतन साथियों। LIC बेच दी, रेल भी बेच दी, बेचने का सिलसिला तो जारी हुआ, वादों का कोई ठिकाना नहीं, उन अच्छे दिनों का अब क्या हुआ? सच का नहीं कहीं निशान साथियों… सौदागरों के हाथों में वतन साथियों। अब चोर कहूँ या फिर चौकीदार इन्हें, ये सेटिंग पे वोटिंग करने लगे, जिंदा इंसान की जब न कीमत मिले, मुर्दों से वोट फिर लेने लगे। बेचे हैं फौजियों के कफ़न साथियों, सौदागरों के हाथों में वतन साथियों। 2)  इन पुढारीयोंसे यारो जरा रहना बचके जळत्या सरणाचेही हे तोडतात लचके फायदा होत नाही तुम्ही जिवंत असून मग धंदा करतात तुमचे कफन विकून अहो वाघाला सांगते, वाघाची मावशी गल्लो गल्ली चर्चा ही होते दर दिवशी अन् भ्रष्टाचार आता हा वाढला किती मांजरीला झाली हो ती उंदराची भीती हिजड्यांच्या हवेलीत ते लपलेरे आता सोशल मीडियावर होते व्हायरल कथा               सोमेश्वर सिरसाट...✍️